Chapter 1 · Page 5 of 8Overall 5 / 30 · preview 5
उसे पता था कि अगर इस वक्त पापा की नजर उस पर पड़ गई, तो इंजीनियरिंग की डिग्री से पहले उसे 'बेरोजगारी और अनुशासन' पर लंबा लेक्चर मिल जाएगा।रसोई की दहलीज पर पहुँचते ही उसने माधवी को पीछे से कसकर पकड़ लिया। "माँ! आज नाश्ते में क्या है? खुशबू तो ऐसी आ रही है कि पड़ोसियों के पेट में भी चूहे कूद रहे होंगे!"माधवी चौंक गईं, पर तुरंत मुस्कुरा दीं। "बदमाश कहीं का! डरा दिया। धीरे बोल,तेरे पापा बाहर ही बैठे हैं।"अर्जुन ने तुरंत अपनी आवाज मद्धम कर ली और एक सेब उठाकर कुतरने लगा। "अरे माँ, पापा तो हिटलर के भारतीय अवतार हैं। उनके अखबार के पीछे क्या चल रहा होता है, कोई नहीं जानता। वैसे, आज फिर भाई मेरी शिकायत लगा कर गए हैं क्या?"माधवी ने उसे प्यार से एक चपत लगाई, "वो तेरा बड़ा भाई है, और फिक्र करता है तेरी। जा, हाथ-मुँह धोकर आ, मैं परांठे लाती हूँ।"अर्जुन अभी माँ के साथ हंसी-मजाक कर ही रहा था कि अचानक बरामदे से एक भारी और कड़क आवाज गूँजी।"माधवी! क्या अर्जुन सोकर उठ गया है?"यह आवाज सुनते ही अर्जुन के हाथ से सेब का टुकड़ा गिरते-गिरते बचा। उसकी देहयष्टि जो अभी कुछ पल पहले ढीली और बेफिक्र थी,