Chapter 1 · Page 4 of 8Overall 4 / 30 · preview 5
विक्रम के जाते ही घर में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था, जिसे सिर्फ रसोई में बर्तनों की खनक काट रही थी। कमरे के अंदर, अर्जुन ने एक लंबी जम्हाई ली और अपनी चादर को पैर से नीचे धकेला। उसने खिड़की के बाहर देखा—धूप काफी चढ़ आई थी।"अरे बाप रे! साढ़े नौ बज गए?" वह खुद से बुदबुदाया और झट से बिस्तर से उतरा।उसने दबे पाँव कमरे का दरवाजा खोला और बिल्ली की तरह दबे कदमों से रसोई की तरफ बढ़ा।