Chapter 1 · Page 3 of 8Overall 3 / 30 · preview 5
"पढ़ रहा था या फोन पर गेम खेल रहा था, ये वो और उसका कमरा ही जानते हैं," मनोज जी की आवाज में वो कड़वाहट थी जिससे घर का तापमान दो डिग्री गिर जाता था।
जबकि दूसरी तरफ, उस बंद कमरे के भीतर, अर्जुन दुनिया की तमाम चिंताओं से बेखबर, चादर ओढ़े खर्राटे ले रहा था। अर्जुन, जो इस घर के सख्त कायदों के बीच एक खिलखिलाता हुआ अपवाद था। वह शांत माधवी, अनुशासित विक्रम और गरम मिजाजी अपने पिता मनोज जी के बीच उस ताजी हवा के झोंके की तरह था, जो जानता था कि मुश्किलों को भी मजाक में कैसे उड़ाया जाता है।
विक्रम घड़ी देखते हुए मुस्कुराया, "उसे जगाना मतलब आफत को दावत देना है। मैं चलता हूँ।"
बरामदे में फिर से अखबार खुल गया, रसोई में फिर से काम शुरू हुआ, लेकिन सबकी सुई अब उस बंद कमरे पर अटकी थी, जहाँ घर का सबसे छोटा और सबसे 'चिल' सदस्य अर्जुन अपनी नींद पूरी कर रहा था।