Chapter 1 · Page 2 of 8Overall 2 / 30 · preview 5
"पापा, मैं निकल रहा हूँ," विक्रम ने धीमे लेकिन स्पष्ट स्वर में कहा।
मनोज जी ने अखबार के ऊपर से अपनी तीखी नजरें उस पर डालीं और बस एक संक्षिप्त सिर हिला दिया। यह उनकी तरफ से 'ठीक है' की आधिकारिक पुष्टि थी।
विक्रम रसोई की खिड़की की ओर मुड़ा और बोला, "माँ, नाश्ता पैक कर दिया क्या?"
माधवी ने एक टिफिन आगे बढ़ाते हुए मुस्कराहट के साथ कहा, "हाँ बेटा, और परांठे गरम हैं, समय पर खा लेना।"
विक्रम ने बैग संभाला और जाने ही वाला था कि अचानक रुक गया। उसने घर के आखिरी कमरे की तरफ इशारा किया जहाँ सन्नाटा पसरा हुआ था। "अर्जुन अभी तक नहीं उठा? इंजीनियरिंग का आखिरी साल है और जनाब अभी भी सपनों की दुनिया में हैं?"
मनोज जी के माथे पर सिलवटें गहरी हो गईं। उन्होंने अखबार बंद करके मेज पर रखा। "इंजीनियरिंग नहीं, वह 'महारत' हासिल कर रहा है—सोने में। उसकी इंजीनियरिंग का नतीजा तो हम देख ही रहे हैं।"
माधवी ने बीच-बचाव करते हुए धीरे से कहा, "रात भर पढ़ रहा था वो, इसी लिए अब तक सोया है।"