Chapter 1 · Page 1 of 8Overall 1 / 30 · preview 5
शादी के बाद शुरू हुई वो कहानी, जिसने दो अजनबियों की किस्मत बदल दी।
घर की दहलीज ,सुबह की पहली किरणें बरामदे में बिछी सफेद चादर पर पड़ रही थीं, लेकिन घर के भीतर का माहौल सूरज की रोशनी से कहीं ज्यादा भारी था।
रसोई से आती मसालों की खुशबू और कड़ाही में छौंक लगने की आवाज इस बात का प्रमाण थी कि माधवी ने मोर्चा संभाल लिया है।
माधवी, जिनका स्वभाव उस बहती नदी की तरह था जो शांत रहकर भी पत्थर काट देती है, बिना किसी शोर-शराबे के रसोई का काम निपटा रही थीं। उनके चेहरे पर वही चिर-परिचित शांति थी, जो अक्सर गहरे धैर्य से आती है।
बरामदे में एक पुरानी आरामकुर्सी पर पुलिस से रिटायर हो चुके मनोज जी बैठे थे। अखबार का पन्ना पलटने की आवाज भी किसी सख्त हिदायत की तरह गूँजती थी। मनोज जी का मिजाज घर में अनुशासन की वह लकीर था, जिसे पार करने की हिम्मत किसी की नहीं होती थी। चश्मा नाक पर टिकाए जब वे खबरों में डूबे होते, तो परिंदा भी पर मारने से पहले सोचता।
तभी जूतों की आहट हुई। विक्रम, कोट के बटन ठीक करता हुआ और अपने लैप टॉप बैग को कंधे पर टांगे बाहर निकला। कॉरपोरेट की भागदौड़ और अनुशासन उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुके थे।
