Chapter 1 · Page 4 of 5Overall 4 / 5
फिर मेरी नज़र परछाई पर ही टिक गई।
क्योंकि...
मैं स्थिर खड़ा था।
लेकिन दीवार पर बनी मेरी परछाई धीरे-धीरे अपना सिर घुमा रही थी।
मेरी तरफ।
उसकी आँखें नहीं थीं।
फिर भी मुझे महसूस हो रहा था कि वह मुझे देख रही है।
अचानक वह परछाई दीवार से अलग हुई।
और फर्श पर रेंगने लगी।
सीधे मेरी ओर।
मैं चीख पड़ा और कमरे से बाहर भागा।
सीढ़ियों की तरफ दौड़ा।
लेकिन जैसे ही नीचे पहुँचा...
मैं रुक गया।
मुख्य दरवाज़ा खुला हुआ था।
बिल्कुल वैसा ही जैसा कॉल में बताया गया था।
और उसके बाहर...
सड़क पर...
दर्जनों लोग खड़े थे।
सभी के सिर झुके हुए थे।
सभी एक जैसे सफेद कपड़े पहने थे।
और सभी मेरे घर को घूर रहे थे।
फिर एक साथ उन्होंने अपने सिर ऊपर उठाए।
उनके चेहरे नहीं थे।
सिर्फ काली खाली त्वचा।
और उसी क्षण वे सब एक साथ बोले—
"वो ऊपर है..."
"उसे पता चल गया..."
"अब उसे भी देखना होगा..."
तभी मेरे मोबाइल पर एक फोटो आई।
अनजान नंबर से।
मैंने काँपते हाथों से फोटो खोली।
फोटो देखकर मेरी चीख निकल गई।
वह फोटो मेरे कमरे की थी।
कुछ सेकंड पहले की।
मैं खिड़की के पास खड़ा था।