Chapter 1 · Page 3 of 5Overall 3 / 5
दरवाज़े के नीचे से अंदर आती वे लंबी, काली उँगलियाँ फर्श को खरोंच रही थीं।
खर्र... खर्र... खर्र...
मैं डर के मारे पीछे हट गया।
तभी बाहर से फिर पापा की आवाज़ आई—
"बेटा... दरवाज़ा खोलो... मैं हूँ..."
लेकिन अब वह आवाज़ इंसानी नहीं लग रही थी।
जैसे कोई मेरे पापा की आवाज़ की नकल कर रहा हो।
मैंने हिम्मत करके पूछा—
"अगर आप पापा हो... तो मेरा जन्मदिन कब है?"
कुछ सेकंड सन्नाटा रहा।
फिर बाहर से धीमी हँसी सुनाई दी।
"मुझे अंदर आने दो... फिर सब बता दूँगा..."
मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई।
तभी कमरे की लाइट झपकने लगी।
ऑन... ऑफ... ऑन... ऑफ...
और अचानक पूरा कमरा अंधेरे में डूब गया।
सिर्फ खिड़की से आती हल्की चाँदनी बची थी।
मैंने मोबाइल की टॉर्च जलाई।
लेकिन जैसे ही रोशनी दरवाज़े पर डाली...
उँगलियाँ गायब थीं।
सब कुछ शांत था।
इतना शांत कि मुझे अपनी धड़कनें सुनाई दे रही थीं।
फिर...
मेरे पीछे से किसी के साँस लेने की आवाज़ आई।
ह्ह्ह्ह्ह....
मैं जम गया।
आवाज़ मेरे बिल्कुल पीछे थी।
लेकिन कमरे में तो मैं अकेला था...
हिम्मत जुटाकर मैंने धीरे-धीरे पीछे देखा।
कोई नहीं।
सिर्फ दीवार पर मेरी परछाई।
मैंने राहत की साँस ली।